बेकार हो गए हैं ट्रैफिक सिग्नल
संत कंवरराम चौराहा पर स्थित चार ट्रैफिक सिग्नल खुद को बेकार मानने लगे हैं। देश के अन्य शहरों में रहने वाले उनके रिश्तेदार चारों के जीवन को व्यर्थ बताते हैं। रिश्तेदारों का कहना है उनकी ज़िंदगी उस कर्मचारी की तरह हो गयी है जो नौकरी तो करता है लेकिन उसके मालिक को कोई लाभ नहीं होता।
बात कुछ हद तक सही भी है क्योंकि चारों सिग्नल का संत कंवरराम चौक पर होना या न होना एक ही बात है। जब तक ट्रैफिक पुलिस ना खड़ी हो वाहन चालक रुकते ही नहीं है।
ट्रैफिक सिग्नल के साथ स्पीड ब्रेकरों का होना तर्कहीन
राजनांदगांव में जहाँ भी ट्रैफिक सिग्नल लगे हैं वहां पर बड़े बड़े स्पीड ब्रेकर भी मौजूद हैं। ट्रैफिक सिग्नल इस बात से खासे नाराज़ हैं। दूसरे शहरों में उनके दोस्त व रिश्तेदार बताते हैं कि जहाँ भी ट्रैफिक सिग्नल होता है वहां स्पीड ब्रेकर नहीं होते क्योंकि दोनों का काम लगभग एक ही है। एक का काम गाड़ी की रफ़्तार को धीमा करना है और दूसरे का गाड़ी को पूर्ण रूप से रोकना। राजनांदगांव में ट्रैफिक सिग्नल के साथ स्पीड ब्रेकरों का होना तर्कहीन है।
स्पीड ब्रेकर बनाने वालों पर ठोकेंगे मानहानि का केस
शहरवासी जब संत कंवरराम चौक से गुज़रते हैं तो ट्रैफिक सिग्नल की बिना परवाह किये अपनी धुन में चले चलते हैं। उनका मानना है कि जब स्पीड ब्रेकर से वाहन की रफ़्तार काम हो ही गयी है तो सिग्नल हरा रहे या लाल क्या फर्क पड़ता है? कुछ हद तक लोगों की सोच ठीक भी है। स्पीड ब्रेकर के रहते ट्रैफिक सिग्नल की आवश्यकता ही नहीं रहती। इस बात को जानने के बाद ट्रैफिक सिग्नल और अपमानित महसूस करने लगे। अब ट्रैफिक सिग्नल अदालत का दरवाज़ा खटकाने को मजबूर हो गए हैं। अब वो हर उस शक्श के खिलाफ मानहानि का दावा करेंगे जिसकी भूमिका स्पीड ब्रेकर बनाने में रही हो और जिसने संत कंवरराम चौक पर ट्रैफिक सिग्नल लगाने का सुझाव दिया हो या ट्रैफिक सिग्नल बनाने वाली कंपनी को आर्डर दिया हो।
पहले आत्मदाह करने जा रहे थे
एक समय पर चारों ट्रैफिक सिग्नल की मायूसी इतनी अधिक थी की उन्होंने शार्ट सर्किट का उपयोग कर आत्मदाह करने का निर्णेय लिया था। फिर उन्होंने एक ट्रक के पीछे लिखा हुआ मुहावरा पढ़ा, "हीरे की क़ाबलियत रखते हो तो अंधेरे में चमक करो, दिन में तो कांच भी चमका करते हैं।" इस मुहावरे को पढ़ने के बाद वो अति प्रेरित हो गए। उनको ध्यान आया की वो वाकई में हीरे हैं जो पूरी दुनिया में अनगिनत लोगों को दुर्घटना से बचाते है और पैदल यात्रियों को सड़क पार कराते हैं। ऐसे महान काम करने वालों को एक छोटे से शहर के चंद लोगों की वजह से खुद के जीवन का अंत करना ठीक नहीं।
किसी बड़े शहर भेजने की अपील की
अब चारों ने छत्त्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री से उनको प्रदेश के किसी बड़े शहर भेजने की अपील की है। उनका मानना है की राज्य के बड़े शहर जैसे रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग आदि में उनकी सेवा की अधिक आवश्यकता है। फ़िलहाल वो जिस स्थान पर खड़े हैं, वहां बिना ट्रैफिक सिग्नल के भी काम चल सकता है। ज़रूरत हो तो बने हुए स्पीड ब्रेकर की संख्या को और बढ़ा देना चाहिए। उन्हें पूरा विश्वास है कि जल्द ही उनका भी तबादला किसी बड़े शहर में हो जायेगा जहाँ लोग उनके महत्त्व को समझते हो और जहाँ चौक चौराहों पर सिग्नल के साथ स्पीड ब्रेकर ना बनाये जाते हों।
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