अख़बारों से तो ये ही पता चलता है
अगर आप रोज़ाना छत्तीगढ़ में प्रकाशित कोई भी अखबार पढ़ते हो तो शायद आपने भी इस बात पर ध्यान दिया होगा कि ख़बरों के साथ जो तस्वीरें होती हैं उनमें लोग फ़ोटो खिंचवाने के वक़्त अपना मास्क नीचे कर लेते हैं। संभव है कि कोरोना वायरस कैमरा देखते ही मर जाता हो। हो सकता है कि ऐसा दावा करने वाला कोई व्हाट्सऐप मैसेज में आया हो जिसे लोगों ने ध्यान से पढ़ा हो और अपने साथियों को भी भेजा हो। हो सकता है कि किसी व्हाट्सऐप फॉरवर्ड में लिखा हो कि जब किसी कैमरा के लेंस में कोरोना से पीड़ित व्यवक्ति आता है तो उसमे से निकलने वाली अल्ट्रा सिस्मिक रेज़ से कोरोना का वायरस मर जाता है। आज के फेक मैसेज की दुनिया में सब कुछ संभव है।
अधिकांश लोग पढ़े लिखे
जब आप ध्यान से ख़बर को पढ़ेंगे तो आपको पता चलेगा कि तस्वीर में दिख रहे अधिकांश लोग शिक्षित हैं। जब लोगों को पता है कि वृक्ष लगाने से पर्यावरण संरक्षण होता है, एडीएम को ज्ञापन सौंपने से कार्रवाही होती है, पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराइ जाती है और है और किसी नेता को ज्ञापन सौंपने से काम कराया जाता है तो लोगों को ये भी पता ही होगा कि कोरोना वायरस से बचाव करने के लिए मास्क पहनना और देह से दूरी रखना कितना आवश्यक है।
अभी भी जागरूकता की कमी
मार्च के महीने से कोरोना वायरस से बचाव के लिए आवश्यक कदम जैसे हाथ धोना, मास्क पहनना, देह से दूरी बनाये रखना आदि का ज़ोर शोर से हर जगह प्रचार किया जा रहा था। देश के प्रधानमंत्री, प्रदेश के मुख्यमंत्री, जिले के कलेक्टर आदि सभी लोग मास्क की आवश्यकता के बारे में बता चुके हैं। छोटे नेता स्थानीय अख़बारों में विज्ञापन देकर बता चुके हैं कि मास्क पहनना कितना कारीगर साबित हो सकता है कोरोना वायरस से बचने के लिए। पर जब रोज़ अख़बारों के पन्ने पलटो तो लगता है कि कोरोना कभी प्रदेश में आया ही नहीं।
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